Saturday, January 16, 2021

जंगे आज़ादी का वो गुमनाम सिपाही जो फ़क़ीर के भेस में घूमता था


 1857 की चिलचिलाती गर्मी मे मंदसौर की एक वीरान पड़ी मस्जिद मे अंग्रेज विरोधी झण्डा उठाए एक 20 साल का कमसिन और खूबसूरत नौजवान अंग्रेजो के खिलाफ जिहाद के लिए हिन्दुओं और मुसलमानों को ललकार रहा था, इस नौजवान ने फकीर का बाना पहना हुआ था


(2012 में अच्छा कैमरा न होने के कारण फोटो अधिक स्पष्ट नही है, आशा करता हूँ कि वो पत्रिका अभी भी मेरे संग्रह में कहीं पड़ी हो, तो मैं अधिक स्पष्ट फोटो लेकर यहां डाल देता हूँ)

ग्वालियर मे अपनी जोशीली तकरीरो के जरिए उसे सिंधिया की फौज की एक टुकड़ी का साथ मिल गया था , जिसके साथ वो मंदसौर की उस मस्जिद मे जमा हुआ था

उसकी ललकार सुनकर हर तरफ से वतन परस्त हिन्दुओं और मुसलमानों की कई टोलियां महावीर की झण्डी और मजहबी हरा परचम लिए इस जिहाद मे शामिल होने खिची चली आईं, और आनन फानन मे मंदसौर के किले पर इन वतन परस्तो का कब्जा हो गया, इस मजबूत फौज के आगे गोरे टिक न पाए


ये बहादुर फकीर अस्ल मे मुगलिया सल्तनत का एक चश्मो चिराग शहजादा फीरोजशाह था, जो मुगल शहजादे जफरुद्दीन का बेटा और बहादुर शाह प्रथम का वंशज था


मंदसौर जीत के बाद शहजादे ने सीतामऊ, जावरा, रतलाम, परताबगढ़ और सालम्बुर के शासकों के पास परवाने भेजे कि वे अंग्रेजो के खिलाफ जंग मे फिरोजशाह का साथ दें, उस वक्त की एक अंग्रेजी रिपोर्ट के मुताबिक

"31अगस्त 1857 को शहजादे ने धार के किले का घेरा डाला । यहाँ से उसे 3 तोप, 1200 सिपाही और डेढ़ लाख रुपये की नजर मिली जो फिरोजशाह ने धार के राजा से जबरन वसूल की "

झांसी, कालपी और फर्रुखाबाद मे गोरो से लोहा लेते हुए शहजादा बरेली पहुंचा जो कि उस समय क्रांतिकारियों की राजधानी बना हुआ था । बरेली मे 18 फरवरी 1858 को शहजादे ने एक घोषणा पत्र जारी किया जिसमें कहा था 

" कोई फरेबी और जालिम इन्सान खुदा के इस फजल ( हिन्दुस्तान ) को बहुत दिनों तक यों ही भोग नहीं सकेगा "


बरेली से फीरोजशाह ने अंग्रेजो को छकाने के लिए एटा की तरफ बढ़ने की खबर फैलाई, और संभल के रास्ते मुरादाबाद की ओर टूट पड़े । इस के बाद शाहजादे की गोरो से टक्कर सिकंदराबाद, बिस्वा, हरचन्दपुर और काल्पी के पास हुई

सीकर मे शहजादे और अंग्रेजो की आखिरी भिड़ंत हुई 1857 की क्रांति की यही आखिरी जन्ग थी, इसमे हार के बाद जंगे आज़ादी के तीनों मजबूत सिपह सालारों यानी तात्या टोपे, राव साहब और फिरोजशाह ने एक दूसरे से अंतिम विदा ली इस आशा के साथ कि हालात बनते ही फिर मिलकर आजादी की जंग लड़ी जाएगी ।


1859 के बाद शायद सिंध के रास्ते फिरोजशाह हिन्दुस्तान से बाहर चले गए और अंग्रेजो के खिलाफ विदेशों से फौजी और माली मदद पाने के लिए जगह जगह की खाक छानते रहे, अंग्रेज जासूसो ने सुराग लगाए कि शहजादे को बुखारा, हेरात, चेज, मकरान और कुस्तुनतुनिया मे देखा गया

एक जासूस ने दिल्ली खबर भेजी थी

"फिरोज शाह एक दम टूटा हुआ इंसान, एक आंख से लगभग काना और लंगड़ा भी हो गया है ।"


जून 1875 मे फिरोजशाह मक्का चले गए और अपनी बेगम को खत भेजकर भारत से बुलाया

हिन्दुस्तान छोड़ते वक्त शहजादे ने अपनी पत्नी को इसलिए तलाक दे दिया था ताकि उन के बाद अंग्रेज उनकी पत्नी को परेशान न करें, और अगर बेगम चाहें तो दूसरा विवाह रचा कर कम से कम भूखी तो न मरे

जरा सोचिए किस दिल से उन दोनों ने इतना कठोर फैसला लिया होगा ?

मक्का शरीफ पहुंच कर बेगम ने एक वर्ष तक अपने बीमार पति की सेवा की । उनके ये दिन बेहद गरीबी मे गुजरे, मक्का के शेख शरीफ और तुर्की से मिलने वाली थोड़ी सी पेंशन मे गुजारा किया

आज से 136 साल पहले हिन्दुस्तान के इस बहादुर सिपाही ने मक्का मे आखिरी सांस ली


जद्दा के ब्रिटिश कान्सुलेट जनरल ने 7 सितंबर 1878 के एक खत मे अदन के ब्रिटिश पाॅलिटिकल एजेंट को लिखा

"फिरोजशाह की मौत 17 दिसंबर 1877 को मक्का मे हुई । उसे यहाँ हाजी फिरोज बिन सुल्तान मिर्जा के नाम से जाना जाता था पर वास्तव मे वह दिल्ली का एक भूतपूर्व शहजादा था और 1857 के गदर से सम्बन्ध रखता था

वह मक्का मे जमादि उल अव्वल 1292 ( जून 1875 ) मे आया था और 12 ज़िलहिज्ज 1294 ( 17 दिसंबर 1877 ) की सुबह अपनी मौत तक यहीं रहा, उस वक्त उसकी पत्नी साथ मे थी, और इन दोनों की एक बेटी हिन्दुस्तान मे बताई जाती है ।"


इस के साथ ही बेगम की पेंशन की अर्जी भी ब्रिटिश सरकार के पास हिन्दुस्तान भेजी गई थी जिसका 4 दिसंबर 1878 मे ये जवाब भेजा गया

"प्रार्थिनी को बता दिया जाए कि भारत सरकार उसकी प्रार्थना को स्वीकार नहीं कर सकती क्योंकि उसका पति बिना आत्मसमर्पण किए मरा है "

बाद मे अंग्रेज सरकार ने बड़ा "उपकार" किया और पेंशन की अर्जी मान ली पर साथ ही ये प्रतिबंध भी लगा दिया कि बेगम कभी लौट कर दिल्ली नहीं आएंगी


अंग्रेज इतिहासकारो ने फिरोजशाह के जिक्र को दबाते हुए उसे अक्सर एक मुगल शहजादा भर लिखा है किन्तु भारतीय इतिहासकारो ने तो अंग्रेजो से भी एक हाथ आगे बढ़ कर देश के इस महान सपूत का कहीं जिक्र ही नहीं किया ...... क्या यही सिला है वतन परस्ती का ...???

(जिया इम्तियाज़)


[ वर्ष 2012 में मैंने रोमन फॉन्ट में ये लेख लिखा था, जिसे 2014 में देवनागरी फॉन्ट मे दोबारा टाइप किया.. ऐतिहासिक तथ्यों के लिए दिसंबर 1977 मे 'कादम्बिनी' मे प्रकाशित "श्री रामेश्वर उपाध्याय" के लेख से साभार ]

दिल्ली के एक खण्डहर में गुमनाम शहज़ादी

 वतन के वास्ते अपना सब कुछ लुटाने वालों के वंशजो की दुर्दशा ॥


  दिल्ली के सरदार पटेल मार्ग स्थित रिज में पहाड़ी पर स्थित है एक महल, जहाँ जाने की अनुमति किसी को नहीं है । उस महल तक पहुँचने के एक मात्र मार्ग पर लगा है लोहे का ग्रिल, जिस पर हल्की-सी आहट होते ही कई कुत्ते भौंकना शुरु कर देते हैं। चारों ओर कंटीली तार के बाड़े से घिरे उस महल के प्रवेश द्वार पर लगे पत्थर पर लिखा है, 'रूलर्स ऑफ अवध: 'प्रिंसेस विलायत महल'


जी हां, आपको जानकर आश्चर्य होगा, लेकिन नवाब वाजिद अली शाह के वंश की आखिरी निशानी अवध के राजकुमार रियाज(अली रज़ा) व राजकुमारी सकीना सन 1984 से वहाँ रह रहे हैं। यह उनका एक ऐसा क्षेत्र है जहाँ बिजली-पानी जैसी बुनियादी सुविधाएँ भी नहीं हैं। उनका खाना, पीना, रहना-सब एक रहस्य है...


अवध के आखिरी शासक नवाब वाजिद अली शाह के हरम में कई रानियां थी, उन्हीं मे से एक रानी जिनका नाम संभवत: ताज आरा बेगम था, जिनकी वंशज थीं राजकुमारी विलायत महल, रियाज व सकीना इसी विलायत महल के बच्चे हैं।


वाजिद अली शाह अंग्रेजो की चापलूसी के बजाय जनता की भलाई के काम करते थे इसलिए अंग्रेजो ने उन्हें पदच्युत कर दिया, जिससे रुष्ट होकर अवध की जनता बेगम हजरत महल के साथ 1857 की क्रांति मे कूद पडी


दण्ड स्वरूप अंग्रेजो ने नवाब के परिवार की सारी सम्पत्ति छीन ली थी ॥

उसके बहुत समय बाद ब्रिटिश सरकार ने नवाब वाजिद अली शाह के परिवार के लिए थोड़ी सी पेंशन देना मन्जूर कर ली थी

सन 1947 में देश आजाद हो गया। आजाद भारत के गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल की कोशिशों से देश की 565 रियासतों का भारत गणराज्य में विलय हो गया लेकिन रियासतों के राजा, रानी, नवाब आदि को अंग्रेजी शासन काल की ही तरह पेंशन की सुविधा मिलती रही

बेगम विलायत महल को 500 रुपए प्रति माह पेंशन मिलता था।


जब इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनी तो उन्होंने सारे राजा-महाराजाओं की पेंशन सहित सभी तरह की सुविधाएँ समाप्त कर दीं। जो राजा-महाराजा शक्तिशाली थे वे राजनीति के मैदान में उतर पड़े और जो कमजोर थे उनकी दशा दयनीय हो गई


विलायत महल के दो छोटे बच्चे थे उनके पति का देहान्त हो चुका था, और वह मजबूत भी नहीं थी इसलिए उनके लिए संकट उत्पन्न हो गया।

कोई उपाय न देखकर विलायत महल ने सन 1975 में अपने दोनों बच्चे रियाज व सकीना सहित 12 कुत्तों और और पांच नौकरों के साथ लखनऊ से दिल्ली की ओर रुख किया और यहाँ के नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के एक प्लेटफॉर्म पर डेरा डाल दिया। बाद में वह अपने कुनबे के साथ प्लेटफॉर्म से उठकर वीआईपी वेटिंग लांज पहुंची और वहाँ कब्जा कर लिया।

हटाने की कोशिश करने पर वह कुत्तों से डरातीं। साथ ही जहर खाकर आत्महत्या कर लने की धमकी भी देती थी।

विलायत महल अपने परिवार व दल के साथ नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर करीब नौ वर्ष तक रहीं, जिसमें से लगातार तीन वर्ष धरना देकर अपने अपने अधिकार की मांग करती रहीं।

उनके धरने की खबर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी तक पहुँची। 1984 में इंदिरा गांधी विलायत महल व उनके बच्चों के हालात का जायजा लेने नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पहुंची।

इंदिरा गांधी को देखते ही विलायत महल फट पड़ी। किसी तरह उन्हें शांत किया गया। इंदिरा गांधी ने उन्हें कहीं और रहने के लिए ठिकाना उपलब्ध कराने का वचन दिया।

विलायत महल की मांग थी कि उन्हें रहने के लिए ऐसी जगह मुहैया कराई जाए जहाँ आम आदमी उनकी जिंदगी में ताक-झांक न कर सके।


(अली रज़ा की एक पुरानी फ़ोटो, जब हालात सामान्य थे)

जगह की तलाश खत्म हुई सरदार पटेल मार्ग स्थित सेंट्रल रिज एरिया में !

सेंट्रल रिज एरिया में मालचा महल स्थित है, जो ऊंची पहाड़ी पर तो स्थित है ही, जंगल से भी घिरा है। यह एक अनजान स्मारक है, जहां के बारे में आज भी दिल्ली के अधिकांश वासी नहीं जानते हैं।

जानकारी के मुताबिक इंदिरा गांधी की मौत के बाद वर्ष 1985 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने विलायत महल को मालचा महल में रहने के लिए स्वीकृति पत्र प्रदान किया था, जिसमें उन्हें नवाब वाजिद अली शाह का वंशज बताया गया था


700 वर्ष पुराने मालचा महल के एक भी दरवाजे पर किवाड़ नहीं लगा है

इसी महल मे 10 सितंबर 1993 में दोपहर 2.40 बजे बेगम विलायत महल ने आत्महत्या कर ली थी। कहा जाता है कि वह अपने जीवन के अकेलेपन से ऊब गई थी और अपने हीरे की अंगूठी को तोड़कर खा लिया था, जिससे उनकी मौत हो गई । मां की मौत के बाद से रियाज व सकीना बिल्कुल अकेले हैं बाहरी दुनिया से दोनों का कोई संपर्क नहीं है



(वो तस्वीरें जब अली रज़ा की मृत्यु के बाद पहली बार मीडिया के कैमरे महल के अंदर पहुँचे)


मालचा महल में न तो बिजली कनेशन है और न ही पानी की पाइप लाइन, लेकिन एमटीएनएल का टेलीफोन कनेक्शन उन्होंने जरूर ले रखा है । एमटीएनएल के लाइन मैन महेन्द्र के अनुसार, दोनों की दुनिया बड़ी रहस्यमयी है । फोन खराब हो जाए तो फोन को बाड़े के अंदर से ही सरका देते हैं, लेकिन हमें अंदर नहीं आने देते । उनकी हालत खस्ता है । ढंग के कपड़े भी उनके शरीर पर नहीं होते, लेकिन राजकुमार के पास रिवाल्वर जरूर है। उसके पास एक टूटी साइकिल भी है। वह खुद के लिए राशन लाने और अपने कुत्तों के लिए मीट लाने के लिए लुंगी व शर्ट पहने बाहर निकलता है और किसी द्वारा कुछ पूछने की कोशिश करने पर रिवाल्वर तान देता है। गेट पर आहट होते ही उसके कुत्ते भौंकने लगते हैं। अब तो कुत्ते भी शायद एक या दो ही बचे हैं। राजकुमार रियाज की अंग्रेजी बहुत अच्छी है, सम्भवत: उसने विदेश से स्कूली शिक्षा प्राप्त की है।

मालचा महल के पास ही अंतरिक्ष अनुसंधान केंद्र(इसरो) का दफ्तर है


इसरो दफ्तर की दीवार के पास और बाड़े के अंदर एक पानी की टंकी लगी है । इसरो से एक पानी की पाइप लाइन निकली है जो उस टंकी से जुड़ी है । इसरो के एक कर्मचारी ने बताया कि दिन में एक बार टंकी भर देते हैं । राजकुमार बाल्टी से उससे पानी निकाल-निकाल कर पानी अंदर ले जाता है।

आज भी रियाज की अकड़ पहले वाले राजकुमार की तरह है। वह हिंदी की बजाय फर्राटेदार अंग्रेजी में बात करना पसंद करता है। वह चाहता है कि लोग उससे 'हुजूर' कह कर बोलें और अदब से पेश आएं।

राजकुमारी भी अकड़ में रहती है, लेकिन वह कभी बाहर नहीं निकलती


स्पष्ट है ये लोग मानसिक रोगी बन चुके हैं । जिस तरह इनके पूर्वजों की भलमनसाहत के चलते एक के बाद एक चीजें इन से छीन ली गईं, उस से इनके दिमाग पर बुरा असर पड़ा है .... ये दोनों भाई बहन अविवाहित हैं, और केवल इसलिए अब तक जी रहे हैं क्योंकि इन्हें अभी मौत नही आई है


(वर्ष 2017 के 2 सितम्बर को इस महल में अली रज़ा को मृत पाया गया, इन्हें दूर से देखने वालों के अनुसार सकीना की मृत्यु इससे कुछ महीनों पूर्व हो चुकी थी, अली रज़ा की मृत्यु के बाद दिल्ली के इस रहस्यमयी मालचा महल के अंदर की तस्वीरें पहली बार दुनिया के सामने आईं... पहली बार देखा गया कि खण्डहर महल के अंदर कीमती कालीनों के अवशेष, राजसी फर्नीचर, पुरानी मगर क़ीमती क्रॉकरी बहुत कुछ  था, लेकिन सब चीज़ों पर एक मनहूसियत सी तारी थी

.... इससे 32 वर्ष पहले इस महल में 3 सदस्य अपने कुछ नौकरों और पालतू कुत्तों के साथ रहने गये थे, इनके जीते जी महल के भीतर जाने और इन लोगों से बातचीत करने की हिम्मत कोई नहीं कर सका, इन लोगों ने खुद को दुनिया से काटकर एक अज्ञात जीवन में खुद को ढाल लिया था... ऐसा असामान्य व्यवहार इन लोगों ने क्यों अपनाया, समझ से परे है ... पर महल के अंदर से कई फोटोग्राफ्स के साथ ही प्रिंसेज सकीना के हाथों लिखी एक इंग्लिश किताब भी मिली है, जो उसने अपनी माँ और अपने परिवार के बारे में लिखी थी, ये किताब ज़ाहिर करती है कि प्रिंसेज सकीना के दिल में ये उत्कंठा थी कि बाहरी दुनिया के लोग उन्हें जानें...

.... सकीना और अली रज़ा दोनों ने ही विदेश में शिक्षा पाई थी, बचपन से लेकर जवानी तक उन्मुक्त और आज़ाद वातावरण में रहने के बाद अचानक किस वजह से उन लोगों ने एकांतवास का चुनाव कर लिया, क्यों उन्होंने विवाह कर के अपना अपना परिवार बनाने की कोशिश नही की, वे लोग, खाते पीते क्या थे, क्या महसूस करते थे बगैर बिजली पानी के जंगल में बने एक खण्डहर में रहते हुए, ऐसे कई प्रश्न हैं जो अली रज़ा की मृत्यु के साथ अनुत्तरित ही रह गए... 

वर्ष 2014 में जब इस नवाब परिवार की त्रासदी के बारे में उपरोक्त लेख लिखा था मैंने, तब सकीना और अली रज़ा जीवित थे, अच्छा लगता यदि ये लोग सामान्य जीवन में लाये जा सकते, लेकिन ऐसा नहीं हो सका और ये कहानी एक त्रासद अंत के साथ खत्म हो गई !!!)

जंगे आज़ादी का वो गुमनाम सिपाही जो फ़क़ीर के भेस में घूमता था

 1857 की चिलचिलाती गर्मी मे मंदसौर की एक वीरान पड़ी मस्जिद मे अंग्रेज विरोधी झण्डा उठाए एक 20 साल का कमसिन और खूबसूरत नौजवान अंग...