Saturday, January 16, 2021

दिल्ली के एक खण्डहर में गुमनाम शहज़ादी

 वतन के वास्ते अपना सब कुछ लुटाने वालों के वंशजो की दुर्दशा ॥


  दिल्ली के सरदार पटेल मार्ग स्थित रिज में पहाड़ी पर स्थित है एक महल, जहाँ जाने की अनुमति किसी को नहीं है । उस महल तक पहुँचने के एक मात्र मार्ग पर लगा है लोहे का ग्रिल, जिस पर हल्की-सी आहट होते ही कई कुत्ते भौंकना शुरु कर देते हैं। चारों ओर कंटीली तार के बाड़े से घिरे उस महल के प्रवेश द्वार पर लगे पत्थर पर लिखा है, 'रूलर्स ऑफ अवध: 'प्रिंसेस विलायत महल'


जी हां, आपको जानकर आश्चर्य होगा, लेकिन नवाब वाजिद अली शाह के वंश की आखिरी निशानी अवध के राजकुमार रियाज(अली रज़ा) व राजकुमारी सकीना सन 1984 से वहाँ रह रहे हैं। यह उनका एक ऐसा क्षेत्र है जहाँ बिजली-पानी जैसी बुनियादी सुविधाएँ भी नहीं हैं। उनका खाना, पीना, रहना-सब एक रहस्य है...


अवध के आखिरी शासक नवाब वाजिद अली शाह के हरम में कई रानियां थी, उन्हीं मे से एक रानी जिनका नाम संभवत: ताज आरा बेगम था, जिनकी वंशज थीं राजकुमारी विलायत महल, रियाज व सकीना इसी विलायत महल के बच्चे हैं।


वाजिद अली शाह अंग्रेजो की चापलूसी के बजाय जनता की भलाई के काम करते थे इसलिए अंग्रेजो ने उन्हें पदच्युत कर दिया, जिससे रुष्ट होकर अवध की जनता बेगम हजरत महल के साथ 1857 की क्रांति मे कूद पडी


दण्ड स्वरूप अंग्रेजो ने नवाब के परिवार की सारी सम्पत्ति छीन ली थी ॥

उसके बहुत समय बाद ब्रिटिश सरकार ने नवाब वाजिद अली शाह के परिवार के लिए थोड़ी सी पेंशन देना मन्जूर कर ली थी

सन 1947 में देश आजाद हो गया। आजाद भारत के गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल की कोशिशों से देश की 565 रियासतों का भारत गणराज्य में विलय हो गया लेकिन रियासतों के राजा, रानी, नवाब आदि को अंग्रेजी शासन काल की ही तरह पेंशन की सुविधा मिलती रही

बेगम विलायत महल को 500 रुपए प्रति माह पेंशन मिलता था।


जब इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनी तो उन्होंने सारे राजा-महाराजाओं की पेंशन सहित सभी तरह की सुविधाएँ समाप्त कर दीं। जो राजा-महाराजा शक्तिशाली थे वे राजनीति के मैदान में उतर पड़े और जो कमजोर थे उनकी दशा दयनीय हो गई


विलायत महल के दो छोटे बच्चे थे उनके पति का देहान्त हो चुका था, और वह मजबूत भी नहीं थी इसलिए उनके लिए संकट उत्पन्न हो गया।

कोई उपाय न देखकर विलायत महल ने सन 1975 में अपने दोनों बच्चे रियाज व सकीना सहित 12 कुत्तों और और पांच नौकरों के साथ लखनऊ से दिल्ली की ओर रुख किया और यहाँ के नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के एक प्लेटफॉर्म पर डेरा डाल दिया। बाद में वह अपने कुनबे के साथ प्लेटफॉर्म से उठकर वीआईपी वेटिंग लांज पहुंची और वहाँ कब्जा कर लिया।

हटाने की कोशिश करने पर वह कुत्तों से डरातीं। साथ ही जहर खाकर आत्महत्या कर लने की धमकी भी देती थी।

विलायत महल अपने परिवार व दल के साथ नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर करीब नौ वर्ष तक रहीं, जिसमें से लगातार तीन वर्ष धरना देकर अपने अपने अधिकार की मांग करती रहीं।

उनके धरने की खबर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी तक पहुँची। 1984 में इंदिरा गांधी विलायत महल व उनके बच्चों के हालात का जायजा लेने नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पहुंची।

इंदिरा गांधी को देखते ही विलायत महल फट पड़ी। किसी तरह उन्हें शांत किया गया। इंदिरा गांधी ने उन्हें कहीं और रहने के लिए ठिकाना उपलब्ध कराने का वचन दिया।

विलायत महल की मांग थी कि उन्हें रहने के लिए ऐसी जगह मुहैया कराई जाए जहाँ आम आदमी उनकी जिंदगी में ताक-झांक न कर सके।


(अली रज़ा की एक पुरानी फ़ोटो, जब हालात सामान्य थे)

जगह की तलाश खत्म हुई सरदार पटेल मार्ग स्थित सेंट्रल रिज एरिया में !

सेंट्रल रिज एरिया में मालचा महल स्थित है, जो ऊंची पहाड़ी पर तो स्थित है ही, जंगल से भी घिरा है। यह एक अनजान स्मारक है, जहां के बारे में आज भी दिल्ली के अधिकांश वासी नहीं जानते हैं।

जानकारी के मुताबिक इंदिरा गांधी की मौत के बाद वर्ष 1985 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने विलायत महल को मालचा महल में रहने के लिए स्वीकृति पत्र प्रदान किया था, जिसमें उन्हें नवाब वाजिद अली शाह का वंशज बताया गया था


700 वर्ष पुराने मालचा महल के एक भी दरवाजे पर किवाड़ नहीं लगा है

इसी महल मे 10 सितंबर 1993 में दोपहर 2.40 बजे बेगम विलायत महल ने आत्महत्या कर ली थी। कहा जाता है कि वह अपने जीवन के अकेलेपन से ऊब गई थी और अपने हीरे की अंगूठी को तोड़कर खा लिया था, जिससे उनकी मौत हो गई । मां की मौत के बाद से रियाज व सकीना बिल्कुल अकेले हैं बाहरी दुनिया से दोनों का कोई संपर्क नहीं है



(वो तस्वीरें जब अली रज़ा की मृत्यु के बाद पहली बार मीडिया के कैमरे महल के अंदर पहुँचे)


मालचा महल में न तो बिजली कनेशन है और न ही पानी की पाइप लाइन, लेकिन एमटीएनएल का टेलीफोन कनेक्शन उन्होंने जरूर ले रखा है । एमटीएनएल के लाइन मैन महेन्द्र के अनुसार, दोनों की दुनिया बड़ी रहस्यमयी है । फोन खराब हो जाए तो फोन को बाड़े के अंदर से ही सरका देते हैं, लेकिन हमें अंदर नहीं आने देते । उनकी हालत खस्ता है । ढंग के कपड़े भी उनके शरीर पर नहीं होते, लेकिन राजकुमार के पास रिवाल्वर जरूर है। उसके पास एक टूटी साइकिल भी है। वह खुद के लिए राशन लाने और अपने कुत्तों के लिए मीट लाने के लिए लुंगी व शर्ट पहने बाहर निकलता है और किसी द्वारा कुछ पूछने की कोशिश करने पर रिवाल्वर तान देता है। गेट पर आहट होते ही उसके कुत्ते भौंकने लगते हैं। अब तो कुत्ते भी शायद एक या दो ही बचे हैं। राजकुमार रियाज की अंग्रेजी बहुत अच्छी है, सम्भवत: उसने विदेश से स्कूली शिक्षा प्राप्त की है।

मालचा महल के पास ही अंतरिक्ष अनुसंधान केंद्र(इसरो) का दफ्तर है


इसरो दफ्तर की दीवार के पास और बाड़े के अंदर एक पानी की टंकी लगी है । इसरो से एक पानी की पाइप लाइन निकली है जो उस टंकी से जुड़ी है । इसरो के एक कर्मचारी ने बताया कि दिन में एक बार टंकी भर देते हैं । राजकुमार बाल्टी से उससे पानी निकाल-निकाल कर पानी अंदर ले जाता है।

आज भी रियाज की अकड़ पहले वाले राजकुमार की तरह है। वह हिंदी की बजाय फर्राटेदार अंग्रेजी में बात करना पसंद करता है। वह चाहता है कि लोग उससे 'हुजूर' कह कर बोलें और अदब से पेश आएं।

राजकुमारी भी अकड़ में रहती है, लेकिन वह कभी बाहर नहीं निकलती


स्पष्ट है ये लोग मानसिक रोगी बन चुके हैं । जिस तरह इनके पूर्वजों की भलमनसाहत के चलते एक के बाद एक चीजें इन से छीन ली गईं, उस से इनके दिमाग पर बुरा असर पड़ा है .... ये दोनों भाई बहन अविवाहित हैं, और केवल इसलिए अब तक जी रहे हैं क्योंकि इन्हें अभी मौत नही आई है


(वर्ष 2017 के 2 सितम्बर को इस महल में अली रज़ा को मृत पाया गया, इन्हें दूर से देखने वालों के अनुसार सकीना की मृत्यु इससे कुछ महीनों पूर्व हो चुकी थी, अली रज़ा की मृत्यु के बाद दिल्ली के इस रहस्यमयी मालचा महल के अंदर की तस्वीरें पहली बार दुनिया के सामने आईं... पहली बार देखा गया कि खण्डहर महल के अंदर कीमती कालीनों के अवशेष, राजसी फर्नीचर, पुरानी मगर क़ीमती क्रॉकरी बहुत कुछ  था, लेकिन सब चीज़ों पर एक मनहूसियत सी तारी थी

.... इससे 32 वर्ष पहले इस महल में 3 सदस्य अपने कुछ नौकरों और पालतू कुत्तों के साथ रहने गये थे, इनके जीते जी महल के भीतर जाने और इन लोगों से बातचीत करने की हिम्मत कोई नहीं कर सका, इन लोगों ने खुद को दुनिया से काटकर एक अज्ञात जीवन में खुद को ढाल लिया था... ऐसा असामान्य व्यवहार इन लोगों ने क्यों अपनाया, समझ से परे है ... पर महल के अंदर से कई फोटोग्राफ्स के साथ ही प्रिंसेज सकीना के हाथों लिखी एक इंग्लिश किताब भी मिली है, जो उसने अपनी माँ और अपने परिवार के बारे में लिखी थी, ये किताब ज़ाहिर करती है कि प्रिंसेज सकीना के दिल में ये उत्कंठा थी कि बाहरी दुनिया के लोग उन्हें जानें...

.... सकीना और अली रज़ा दोनों ने ही विदेश में शिक्षा पाई थी, बचपन से लेकर जवानी तक उन्मुक्त और आज़ाद वातावरण में रहने के बाद अचानक किस वजह से उन लोगों ने एकांतवास का चुनाव कर लिया, क्यों उन्होंने विवाह कर के अपना अपना परिवार बनाने की कोशिश नही की, वे लोग, खाते पीते क्या थे, क्या महसूस करते थे बगैर बिजली पानी के जंगल में बने एक खण्डहर में रहते हुए, ऐसे कई प्रश्न हैं जो अली रज़ा की मृत्यु के साथ अनुत्तरित ही रह गए... 

वर्ष 2014 में जब इस नवाब परिवार की त्रासदी के बारे में उपरोक्त लेख लिखा था मैंने, तब सकीना और अली रज़ा जीवित थे, अच्छा लगता यदि ये लोग सामान्य जीवन में लाये जा सकते, लेकिन ऐसा नहीं हो सका और ये कहानी एक त्रासद अंत के साथ खत्म हो गई !!!)

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